गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

"स्क्रीन" कि छपाई

दुसरे यात्रा संगनीर मैं कुछ कारखानों में कारीगरों से मिली. मैं चादर के कारखाने में गयी. इस कारखाने में चादर "स्क्रीन" के साथ छापा जाता है. लम्बी मेजों पर मोम फैलापा जाता है. बाद में सादे कपडे को मेजों पर रखा जाता है. तब दो आदमी साथ-साथ काम करते हैं. एक आदमी एक "स्क्रीन" कि बगल से पकड़ते हैं. और दुसरे आदमी बारी-बारी से स्याही को "स्क्रीन" पर रखते हैं. इस दंग से वे स्याही को कपडे पर फैलाते हैं. जल्दी-जल्दी वे हर रंग लगाते हैं. लगाने से पहले "किशान्गीर" से "ग्रे" कपडे बेचा जाता है. बाद में यह कपडा संगनीर में सफ़ेद किया जाता है. कारखाने में सफ़ेद किए हुए कपडे पहुँचते हैं. जिस कारखाने में मैं मिल हर दिन लगभग एक हजार चादरे "स्क्रीन" पर लगायी जाती हैं. और भी कारखाने जिनमे हाथ से छपाई है अक्सर "स्क्रीन" कि छपाई भी है. उधिरण के लिए एक कारखाने जिस का नाम "साक्षी" है कुछ हाथ कि छपाई है लेकिन "स्क्रीन" कि छपाई ज़्यादातर काम किया जाता है. इस कारखाने का मालिक ने मुझ से कहा कि इस हिस्से का कारखाना नई-सौ है. और हालांकि उसके परिवार के कारखाने में पहले से सिर्फ़ हाथ से छपाई कि जाती थी तो आजकल "स्क्रीन" का काम फायदा बनाता है.

3 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

वर्ड वेरिपिकेशन हटा लें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी. बस एक निवेदन है.

डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर ने कहा…

thhai bhai , aisa hee karenge

रचना गौड़ ’भारती’ ने कहा…

ब्लोगिंग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लिखते रहिये.